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चम्पारण के बाढ़ में बह गई सरकारी मशीनरी!

चम्पारण के बाढ़ में बह गई सरकारी मशीनरी!

अफ़रोज़ आलम साहिल

बेतिया/मोतिहारी : बिहार के चम्पारण इलाक़े में बाढ़ अब एक ‘सरकारी त्रासदी’ में तब्दील हो चुकी है. ‘सरकारी त्रासदी’ इसलिए कि बाढ़ पीड़ित इलाक़े में सरकार का कहीं अता-पता नहीं है.

गांव के गांव डूब चुके हैं. आबादी का एक बड़ा इलाक़ा सड़कों पर आ चुका है. हाईवे के किनारे जहां भी सूखी जगह मिल रही है, लोग बरसाती की छत तान कर रह रहे हैं. बाढ़ की तबाही का अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि मोतिहारी-रक्सौल को जोड़ने वाला एनएच—28 हाईवे पर नदी जैसा मंज़र रहा. इस हाईवे पर नाव चल चुकी है. ज़्यादातर सड़कें अब पूरी तरह से बर्बाद हो चुकी हैं. कुछ जगहों पर रेलवे पटरियां ध्वस्त हो चुकी हैं. अभी भी नरकटियागंज से बगहा के बीच ट्रेनों का परिचालन बंद है. जिसके कारण दिल्ली से आने वाली ट्रेनें गोरखपुर से सीवान के रास्ते मुज़फ़्फ़रपुर पहुंच रही हैं.

स्पष्ट रहे कि बाढ़ आने के क़रीब दो सप्ताह बाद भी पश्चिम चम्पारण में चनपटिया से लेकर वाल्मिकी नगर तक लोगों को अभी भी सरकारी मदद पहुंचने का इंतज़ार है. वहीं पूर्वी चम्पारण में सुगौली से लेकर ढाका और बंजरिया तक बाढ़ पीड़ितों की अच्छी-ख़ासी तादाद दाने-दाने को मोहताज हो चली है. सबसे बड़ी दिक्कत पीने के पानी की है. चारों ओर पानी ही पानी है, मगर पीने के लिए एक बूंद भी नहीं है.

ऐसे में सरकार की ओर से कहीं कोई मदद नहीं पहुंची है. इक्का-दुक्का जगहों पर सिर्फ़ दो-चार दिनों तक गुड़ व चूड़ा जैसी चीज़ें बांटी गई, मगर अब वो भी ठप्प है. एनडीआरएफ़ की टीम भी दूर-दराज इलाक़े में पहुंच ही नहीं पा रही हैं. लोग अपनी लकड़ी की नाव या फिर टायर व केले के थम से नाव बनाकर तैरा करते हैं और लोगों को सुरक्षित जगह पर पहुंचा रहे हैं. यही वजह है कि लोगों का गुस्सा अब साफ़ तौर पर हर जगह दिखने लगा है. लेकिन लोगों के विरोध को दबाने के लिए उल्टा इन पीड़ितों पर मुक़दमें करने के मामले भी सामने आ रहे हैं.

बताते चलें कि 22 अगस्त को तिरूआह क्षेत्र के बाढ़ पीड़ितों ने राहत के लिए अंचल कार्यालय पहुंच हंगामा किया. अधिकारियों के नहीं मिलने पर नानोसती चौक जाकर एनएच 28बी को घंटों जाम कर दिया. अब वहां के बीडीओ जितेन्द्र राम के आवेदन पर एनएच जाम करने और सरकारी काम में बाधा पहुंचाने को लेकर हरपुर गढ़वा पंचायत के मुखिया पति अली असग़र समेत आठ लोगों पर केस दर्ज किया गया है. इसके अलावा सैकड़ों अज्ञात लोगों को इस मुक़दमें में शामिल किया गया है.

यहां यह भी स्पष्ट रहे कि जहां बाढ़ का पानी ख़त्म हो गया है, वहां अब भी बाढ़ का मंज़र याद कर लोग कांप उठते हैं. मिसाल के तौर पर वाल्मिकी व्याघ्र परियोजना के बीच में स्थित औरहिया दोन गांव की ज़िन्दगी तो शुरू हो गई है. लेकिन यहां मसान नदि ने अधिकांश लोगों को बेघर कर दिया है. कड़ी धूप में यहां के लोग अपने अस्थायी बसेरेको मज़बूत करने में लगे हुए हैं. यहां भी सरकारी मदद न मिलने से लोगों में काफी रोष है.         

सच तो यह है कि इस सरकारी त्रासदी के बीच अगर आम लोगों की मदद न होती तो बाढ़ में मरने वालों की संख्या यक़ीनन हज़ारों में होती. सच तो यह है कि लोगों की आपसी मदद और भाईचारा ही जीने का सबसे बड़ा ज़रिया बन चुका है. स्थानीय लोग ही तमाम तरह की बातों को भूल, धर्म व जाति से ऊपर उठकर हर तरह की मदद कर रहे हैं. बड़े-बड़े बर्तनों में खिचड़ी पकाकर बाढ़ पीड़ितों तक पहुंचा रहे हैं.

मोतिहारी के वरिष्ठ पत्रकार अक़ील मुश्ताक़ TwoCircles.net के साथ बातचीत में बताते हैं कि, पूर्वी चम्पारण में बाढ़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित सुगौली व बंजरिया हुआ है. बंजरिया प्रखंड की हालत ये है कि यहां 1 लाख 62 हज़ार की आबादी बाढ़ में फंसी रही. यहां सरकार ने सिर्फ़ 19 छोटे नाव लगाए. इस पर भी जन-प्रतिनिधियों ने अपना क़ब्ज़ा जमा रखा था. इस पर भी सितम ये कि रेस्क्यू के नाम पर लोगों से 150-150 रूपये वसूल किए गए.

वो बताते हैं कि इस बाढ़ राहत के नाम पर पूरे चम्पारण में लूट-खसोट जारी है. अधिकारियों की बल्ले-बल्ले रही. राहत सामग्री वितरण के नाम पर जमकर घोटाला किया गया है. कागज़ों में हज़ारों शिविर बनाए गए, जो हक़ीक़त की धरातल कहीं नज़र नहीं आएं.

सरकारी लूट-खसोट का अंदाज़ा आप सिर्फ़ इस ख़बर से ही लगा सकते हैं कि पश्चिम चम्पारण ज़िले के नरकटियागंज इलाक़े में बाढ़ के कारण लाखों रूपये की क़ीमत की दवा ख़राब होने का मामला सामने आया है. इस मामले में अब ज़िला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. किरण शंकर झा ने नरकटियागंज पीएचसी प्रभारी व स्वास्थ्य प्रबंधक से रिपोर्ट तलब की है.

यहां लोगों की ये भी शिकायत है कि प्रखंड विकास पदाधिकारी ने तमाम स्कूलों के हेडमास्टरों को ये आदेश दिया था कि वो मिड-डे मिल के लिए मौजूद अनाज को पकाकर बाढ़ पीड़ितों में बांटा जाए, लेकिन ज़्यादातर स्कूलों ने कोई खाना नहीं बांटा, लेकिन कागज़ों में दिखाया गया कि खाने बांटने की वजह से अब मिड डे मील का अनाज व राशन ख़त्म हो चुका है.

सरकारी लूट-खसोट के अलावा अब व्यसायियों की लूट-खसोट की कहानी भी सामने आने लगी है. इस बाढ़ में राहत के नाम पर हर कोई चूड़ा बांट रहा है, इसलिए अब शहर से लेकर गांव की मंडियों से चूड़ा ख़त्म हो गया है. यहां के व्यवसायियों की मानें तो अब चूड़ा अन्य राज्यों व ज़िलों से मंगवाया जा रहा है. इसकी बढ़ती खपत के कारण ये थोक बाज़ार में प्रति क्विंटल दो सौ से तीन सौ रूपये महंगा हो गया है.     

चम्पारण की ये दशा सरकारी मशीनरी के ‘ब्रेक-डाऊन’ की जीती-जागती कहानी है. दुखद पहलू ये है कि पानी जहां-जहां पहुंचा है, सरकार वहां तक नहीं पहुंच पाई है. ये ‘इत्तेफ़ाक़’ कब तक बना रहेगा कोई नहीं जानता.

सवाल ये है कि जिन प्रतिनिधियों को लोगों ने चुना है, वो आफ़त की इस घड़ी में कहां हैं? सरकार क्या कर रही है? साधनों की कोई कमी न होने के बावजूद इन्हें ज़मीन पर उतारा क्यों नहीं जा रहा है? सरकार द्वारा बाढ़ पीड़ितों के पास जो राशन-पानी और सहायता पहुंचाने का दावा किया जा रहा है, वो कहां पहुंच रहा है? आख़िर ये सहायता किसके पास जा रही है? कहां स्टोर हो रही है? रोज़ ही हो रही मासूमों की मौत का ज़िम्मेदार कौन है? क्या सरकारें वाक़ई अंधी होती हैं? ये सुलगते हुए सवाल हैं, जो इस बाढ़ की चपेट में और भी ज़्यादा भभक उठे हैं.

(अफ़रोज़ आलम साहिल ‘नेशनल फाउंडेशन फ़ॉर इंडिया’ के ‘नेशनल मीडिया अवार्ड -2017’ के अंतर्गत इन दिनों चम्पारण के किसानों व उनकी हालत पर काम कर रहे हैं. इनसे [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है.) (Courtesy: TwoCircles.net)

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