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मोतिहारी में सर सैय्यद के ख़्वाबों के क़ातिल

मोतिहारी में सर सैय्यद के ख़्वाबों के क़ातिल

By Afroz Alam Sahil

मुसलमानों में नए-नए ‘मसीहाओं’ ने अपनी ‘मसीहाई’ के प्रदर्शन का एक नया ज़रिया तलाश लिया है. हक़ीक़त में ये ‘ज़रिया’ उनका ‘धंधा’ है, जिसके सहारे वो अपने क़ौम के लोगों को बेवक़ूफ़ बनाकर खुद को सियासत में स्थापित करना चाह रहे हैं. ये नया ‘धंधा’ क़ौम के ऐतिहासिक रहनुमाओं के नाम पर ‘मुशायरा’ आयोजित करना है.

इन ‘मुशायरों’ के नाम पर क़ौम और कुछ राजनीतिक दलों व नेताओं से अच्छा-ख़ासा चंदा जुटाया जाता है. खुद की बड़ी तस्वीरें से लैस होर्डिंग्स शहर के बाइपास, चौक चौराहों, मार्केट, सड़कों और गलियों में लगाकर खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश की जाती है और इन्हीं तस्वीरों की बुनियाद पर पूरी क़ौम में खुद की ‘मसीहाई’ का ढ़ोल पीट दिया जाता है. ‘कमीनेपन’ की हद ये होती है कि इनकी तस्वीरें उन रहनुमाओं के तस्वीरों से बड़ी होती है, जिनके नाम पर ये प्रोग्राम आयोजित की जा रही होती है.

मोतिहारी में सर सैय्यद अहमद खान के नाम पर आयोजित होने वाले ‘मुशायरे’ को आप इसी ‘धंधे’ की ताज़ा दास्तान के तौर पर देख सकते हैं. मोतिहारी में लगे होर्डिंग्स से ही आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इन्हें न तो सर सैय्यद से मतलब है, न उर्दू जबान की तरक़्क़ी से और न ही हिन्दु-मुस्लिम एकता से… ये मुकम्मल तौर पर अपनी राजनीति चमकाने का नायाब ‘मसीहाई’ तरीक़ा है.

सच पूछे तो ये सर सैय्यद के ख़्वाबों के क़ातिल हैं. अगर आप इनको सर सैय्यद के असल मक़सद को बताने की कोशिश कीजिएगा तो ये बदज़ुबानी पर उतर आएंगे. ये फ़र्ज़ी  कार्यकर्ता व ‘मसीहा’ आपको औक़ात दिखाने लगेंगे. मरने-मारने की बात करने लगेंगे… ऐसा करते वक़्त ये यह भी भूल जाते हैं कि जब लोगों ने सर सैय्यद के साथ बदसुलूकी की तो उन्होंने किस तरह से रिएक्ट किया था. 

सर सैय्यद अहमद खान हमारे क़ौम की शान हैं, लेकिन इन कथित ‘मसीहाओं’ ने इन्हें भी नहीं बख़्शा. बता दें कि सर सैय्यद अहमद खान ने कभी भी इस तरह के दकियानूसी ढ़कोसलों की हिमायत नहीं की. उन्होंने क़ौम से मस्जिद की मीनारों को बेमतलब ऊंचा करने के बजाए तालीम पर ध्यान केन्द्रित करने को कहा. उनकी पूरी उम्र सिर्फ़ और सिर्फ़ तालीम की बरकत के ख़ातिर गुज़र गई. लेकिन इन कथित बदज़ुबना ‘मसीहाओं’ को कौन समझाए कि सर सैय्यद के नाम पर भाषण देकर, मुशायरों का आनंद लेकर और डिनर खा हाथ पोछने से कुछ नहीं होगा. कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि मुस्लिम क्षेत्रों में शिक्षा पहुंचे… अगर हम सच में सर सैय्यद को सही मायनों में श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो उनकी सोच को आगे बढ़ाने का काम करना होगा. उनकी सोच इस देश के मुसलमानों को ज़लालत और पिछड़ेपन से निकालना था…

(ये पोस्ट उनके फेसबुक टाईमलाईन से ली गई है.)

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